प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक: क्या एक स्वस्थ बच्चे की आशा संभव है?

लेखक की तस्वीरलेखक: Philomena Marx06 जनवरी 2025
प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक का प्रतीकात्मक चित्र

प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक (Pre-Implantation Genetic Testing, PGT) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें भ्रूण (Embryo) को गर्भाशय में प्रत्यारोपित करने से पहले ही उसकी आनुवंशिक जाँच की जाती है। भारत में यह तकनीक उन दंपतियों के लिए आशा की किरण बन सकती है, जो गंभीर अनुवांशिक बीमारियों की उच्च आशंका या बार-बार गर्भपात (Miscarriage) जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। हालाँकि, भारत में भी कई नैतिक, कानूनी और तकनीकी सवाल हैं, जिन पर गहन विचार की आवश्यकता है।

प्रयोगशाला से गर्भाशय तक: कृत्रिम गर्भाधान कैसे होता है

भ्रूण को शरीर के बाहर विकसित करने के लिए सबसे पहले कृत्रिम गर्भाधान (Assisted Reproductive Technology – ART) की आवश्यकता पड़ती है। आम तौर पर इसके लिए इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) या इंट्रा-साइटोप्लाज़मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) का सहारा लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं:

  • डिम्बग्रंथि (ओवरी) की हार्मोनल स्टिम्यूलेशन: महिला को ऐसे हार्मोन दिए जाते हैं, जिनसे एक ही समय में कई अंडाणुओं (Eggs) का परिपक्व होना संभव हो सके।
  • अंडाणुओं का निकालना (ओवम पिक-अप): जब अंडाणु पर्याप्त विकसित हो जाते हैं, तो एक छोटे-से ऑपरेशन द्वारा उन्हें ओवरी से निकाला जाता है।
  • लैब में निषेचन (Fertilization): निकाले गए अंडाणुओं को या तो शुक्राणुओं (Sperm) के साथ पोषक माध्यम में रखा जाता है या फिर ICSI के द्वारा सीधे अंडाणु में शुक्राणु डाला जाता है।
  • आनुवंशिक परीक्षण: जब भ्रूण कुछ दिनों (आमतौर पर चौथे या पाँचवें दिन) तक विकसित हो जाता है, तो उसकी कुछ कोशिकाएँ निकालकर जाँच की जाती हैं, ताकि किसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी या गुणसूत्रीय असामान्यता का पता लगाया जा सके।
  • गर्भाशय में प्रत्यारोपण (Embryo Transfer): जिन भ्रूणों में कोई अनियमितता नहीं पाई जाती, उन्हें गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। जिन भ्रूणों में गंभीर समस्याएँ दिखती हैं, उन्हें आगे विकसित नहीं किया जाता।

यह प्रक्रिया शारीरिक और भावनात्मक रूप से काफ़ी थकाने वाली हो सकती है। साथ ही, अगर गर्भधारण सफल होता है तो भी आगे चलकर कुछ अतिरिक्त परीक्षण (जैसे अम्निओसेंटेसिस या आनुवांशिक अल्ट्रासाउंड) कराए जा सकते हैं, ताकि किसी भी संभावित ग़लत जाँच के जोखिम को कम किया जा सके।

भारत में क़ानूनी स्थिति: क्या अनुमति है और क्या नहीं?

भारत में प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक को अभी भी स्पष्ट रूप से विस्तार से नियंत्रित करने के लिए अलग से कोई विशेष कानून तो नहीं है, लेकिन यह कई अन्य क़ानूनी ढाँचों और दिशानिर्देशों के दायरे में आता है। इनमें प्रमुख हैं:

  • ICMR (Indian Council of Medical Research) दिशानिर्देश: ये दिशानिर्देश ART (Assisted Reproductive Technology) के विभिन्न पहलुओं पर नैतिकता और मानक तय करते हैं, जिनमें प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक भी शामिल है।
  • PCPNDT Act, 1994 (Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques): हालाँकि यह क़ानून मुख्यतः गर्भाधान से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन और भ्रूणहत्या रोकने के उद्देश्य से बना है, फिर भी जीन संबंधी परीक्षणों के दुरुपयोग के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाती है।
  • ART (Regulation) Act और Surrogacy (Regulation) Act: हाल के वर्षों में भारत सरकार ने सहायक प्रजनन तकनीक एवं सरोगेसी को लेकर क़ानून बनाने की पहल की है। हालाँकि, इन विधेयकों/क़ानूनों में PGD को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश धीरे-धीरे ही विकसित हो रहे हैं।

कुल मिलाकर, प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक (PGT) आमतौर पर उन्हीं दंपतियों के लिए अनुशंसित है, जहाँ किसी गंभीर आनुवांशिक विकार का जोखिम बहुत अधिक हो। इसके अलावा, नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से किसी भी शोषण (जैसे लिंग-चयन) को रोकने के लिए सख़्त प्रावधानों की ज़रूरत होती है, जिनकी जाँच संबंधित अथॉरिटीज़ और मेडिकल एथिक्स कमेटियों द्वारा की जाती है।

नैतिक द्वंद्व: चयन और मानव गरिमा के बीच

प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक की सबसे बड़ी नैतिक चुनौतियों में से एक है कि हम भ्रूणों को “माँग” के मुताबिक़ चुन रहे हैं। इस प्रक्रिया से कुछ लोगों को डर है कि आने वाले समय में तकनीक का उपयोग केवल बीमारियों को रोकने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि “डिज़ायनर बेबी” बनाने जैसे विवादास्पद विकल्प तक बढ़ सकता है।

यह प्रश्न भी उठता है कि मानव जीवन का आरंभ कब माना जाए और किस स्तर पर भ्रूण को नैतिक रूप से पूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए। इस तरह की बहसें केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज और संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

एथिक्स कमेटियाँ: निर्णय कौन लेता है और किन मापदंडों पर?

भारत में विभिन्न प्रतिष्ठित अस्पतालों और शोध संस्थानों के अपने-अपने इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी (IEC) या इंस्टीट्यूशनल रिव्यू बोर्ड (IRB) होते हैं, जो चिकित्सा और शोध से जुड़े मामलों पर नैतिक रूप से उचित निर्णय लेने में मदद करते हैं। प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक के मामलों में भी विशेषज्ञों की ऐसी टीम शामिल होती है, जिसमें डॉक्टर, जेनेटिक्स विशेषज्ञ, कानूनी सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता हो सकते हैं।

कमेटी सामान्यतः निम्नलिखित पहलुओं पर विचार करती है:

  • संभावित आनुवांशिक बीमारी की गंभीरता और उसके माँ या बच्चे पर पड़ने वाले प्रभाव।
  • परीक्षण करने की आवश्यकता, सुरक्षा, वैधता और विश्वसनीयता।
  • दंपति को दी गई परामर्श प्रक्रिया (काउंसलिंग) की गुणवत्ता और विस्तार।

इस तरह की एथिक्स कमेटियाँ एक नियंत्रण-तंत्र की तरह काम करती हैं, ताकि प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक का उपयोग केवल वास्तविक ज़रूरतों के लिए हो और इसका दुरुपयोग न हो।

विभिन्न राज्यों के नियम: भारतीय संदर्भ में जटिलताएँ

भारत में स्वास्थ्य primarily राज्य का विषय होने के बावजूद, केंद्र सरकार के स्तर पर भी कई दिशा-निर्देश और कानून लागू होते हैं। कई राज्यों में ICMR के दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य है, वहीं कुछ जगहों पर स्थानीय मेडिकल काउंसिल या स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त शर्तें भी होती हैं।

उदाहरण के लिए, कुछ बड़े राज्यों या मेट्रो शहरों (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, तमिलनाडु) में अत्याधुनिक IVF/PGT केंद्र उपलब्ध हैं, जहाँ आधुनिक तकनीकों की सुविधा है। वहीं, दूरदराज़ के इलाकों में ऐसे केंद्रों की कमी होने से दंपतियों को अन्य राज्यों का रुख़ करना पड़ सकता है।

खर्चों की पड़ताल: कितना भुगतान बीमा कवर करती है?

IVF और प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक दोनों ही काफ़ी महँगी प्रक्रियाएँ हैं। आईवीएफ की लागत ही कई बार 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकती है, जबकि PGT के लिए अतिरिक्त जाँच-परीक्षण के खर्च और एथिक्स कमेटी की फ़ीस जोड़ लें, तो कुल लागत आसानी से 3–5 लाख रुपये (या उससे भी अधिक) तक पहुँच सकती है।

भारतीय स्वास्थ्य बीमा पॉलिसीज़ में आम तौर पर प्रजनन उपचार (Infertility Treatments) का कवरेज सीमित या बिल्कुल नहीं होता। हालाँकि, कुछ प्राइवेट बीमा कंपनियाँ हाल के दिनों में प्रजनन संबंधी कुछ खर्चों को आंशिक रूप से कवर कर रही हैं। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत) में फिलहाल इस तरह की प्रक्रियाओं के लिए बहुत सीमित विकल्प हैं। दंपतियों को सलाह दी जाती है कि वे जल्द से जल्द अपनी बीमा कंपनी से संपर्क कर पूरी जानकारी लें।

सफलता के अवसर और जोखिम: दंपतियों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

पूरी प्रक्रिया — हार्मोनल स्टिम्यूलेशन, अंडाणु एवं शुक्राणु की गुणवत्ता, लेबोरेटरी तकनीक, और भ्रूण प्रत्यारोपण — शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। औसत रूप से देखा जाए तो एक IVF चक्र में प्रति अंडाणु-संग्रह (Oocyte Retrieval) सफलता दर लगभग 18-20% या इससे कुछ अधिक हो सकती है, हालाँकि यह महिला की आयु, उसकी स्वास्थ्य स्थिति और प्रयोगशाला की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

अच्छी बात यह है कि भारत में कई अत्याधुनिक प्रजनन केंद्र हैं, जहाँ विशेषज्ञ प्रजनन चिकित्सक, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, आनुवांशिकी (जेनेटिक्स) विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक मिलकर काम करते हैं। वे प्रक्रिया से जुड़े जोखिमों को कम करने की कोशिश करते हैं और मरीज़ों को शारीरिक के साथ-साथ भावनात्मक सहयोग भी देते हैं।

अनुभव कथाएँ: जब उम्मीद और चुनौतियाँ टकराती हैं

कई दंपति जो प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक का रास्ता अपनाते हैं, उनके लिए यह सफ़र भावनात्मक उतार-चढ़ाव से भरा हो सकता है। कुछ लोगों को पहले ही प्रयास में सफलता मिल जाती है और वे स्वस्थ शिशु की उम्मीद करने लगते हैं, जबकि दूसरों को कई बार असफलता और निराशा का सामना करना पड़ता है।

“दो गर्भपातों के बाद हमने प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक कराने का फ़ैसला लिया। यह सफ़र बहुत कठिन था, लेकिन अंत में हमने एक स्वस्थ बच्चे का स्वागत किया। इसके लिए हम बेहद आभारी हैं।”
–अन्ना और थॉमस एम.

इस तरह के अनुभव बताते हैं कि यह निर्णय व्यक्तिगत परिस्थितियों और भावनात्मक स्थिति पर निर्भर करता है। दंपतियों को अक्सर अपनी आशाओं, आशंकाओं और पारिवारिक मूल्यों के बीच गहरा संतुलन बनाना पड़ता है।

नई तकनीकें: आगे क्या?

प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक का क्षेत्र लगातार विकसित हो रहा है। नेक्स्ट-जनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) जैसी उन्नत तकनीकें जीन का संपूर्ण विश्लेषण करने की सुविधा देती हैं, जिससे संभावित बीमारियों का पता पहले से और सटीकता से लगाया जा सकता है। इससे सफलता की दर बढ़ने की उम्मीद है और ग़लत-नकारात्मक या ग़लत-सकारात्मक परिणामों की संभावना कम हो सकती है।

लेकिन हर तकनीकी प्रगति के साथ नई नैतिक चुनौतियाँ भी आती हैं। क्या हम सिर्फ़ बीमारियों की रोकथाम के लिए तकनीक का इस्तेमाल करेंगे या शरीर/दिमाग़ से जुड़े “इच्छित” लक्षणों के लिए भी? समाज को यह तय करना होगा कि कहाँ नैतिक सीमाएँ खींचनी हैं और क़ानूनों को भी उन्हीं के अनुरूप विकसित होना होगा।

निष्कर्ष: चिकित्सा प्रगति और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन

प्रिइम्प्लांटेशन डायग्नोस्टिक उन दंपतियों के लिए बड़ा वरदान साबित हो सकता है, जो गंभीर आनुवांशिक बीमारियों या बार-बार गर्भपात के कारण संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। हालाँकि, इसके साथ उच्च लागत, शारीरिक-मानसिक बोझ और गहन नैतिक सवाल जुड़े हुए हैं।

इसलिए, दंपतियों को सही निर्णय लेने से पहले विस्तृत परामर्श (काउंसलिंग) करवाना और चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ नैतिक एवं कानूनी सलाहकारों से भी विचार-विमर्श करना चाहिए। अंतिम फ़ैसला हर दंपति की व्यक्तिगत परिस्थिति और मूल्यों पर निर्भर करेगा, लेकिन जागरूकता और संपूर्ण जानकारी से लैस होना पहला और सबसे अहम क़दम है।